🌿🌿पत्नियों के प्रिय जुमले 🌿🌿

🌿🌿पत्नियों के प्रिय जुमले 🌿🌿
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यदि आप इनसे वंचित हैं तो यकीन मानिए कि आप बहुत सौभाग्यशाली है।
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🎋शादी के तीन महीने बाद 🎋

क्या कर रहे हैं ? कोई आ जाएगा, थोड़ी बहुत शर्म-वर्म है कि नहीं ?

🎋शादी के चार महीने बाद 🎋

सोने दो, तुम्हारी माँ चाहती है कि सुबह छः बजे मैं मन्दिर में उनके साथ 🔔 घंटियां बजाऊँ।

🎋छह महीने बाद 🎋

मेरे मैके नहीं तो, अपनी ससुराल ही ले चलो।

🎋दस महीने बाद 🎋

एेसी हालत में शर्मा जी अपनी पत्नी का कितना ध्यान रखते हैं, और एक तुम हो की?

🎋बारह महीने बाद 🎋

अपनी माँ की तरह बातें मत करो, लडका हो या लडकी क्या फर्क पड़ता है?

🎋पन्द्रह महीने बाद 🎋

जब तुम दुबले-पतले हो तो गुडिया आठ पॉऊण्ड की कैसे होती, हर बात में मुझे ही दोष देते हो।

🎋अट्ठारह महीने बाद 🎋

हाँ-हाँ सब गुडिया से बहुत प्यार करते हैं, लेकिन चेन, अंगुठी तो मेरे मैके वालों ने ही दी, देख लिया सबका प्यार।

🎋दौ साल बाद 🎋

बिट्टो को बुखार है, और तुम आफिस की फाइलों में सर खफा रहे हो? तुममें अक्ल नाम की कोई चीज है कि नहीं?  

🎋तीन साल बाद 🎋

कॉन्वेंट में ही डालेंगे, नहीं तो अपने बाप की तरह रह जाएगी, और तुम तो इस मामले में नहीं बोलो तो ही अच्छा है।

🎋चार साल बाद 🎋

अब तुम्हारा भी एक परिवार है, कब तक माँ बाबूजी के पल्लू से चिपके रहोगे? बड़े भैया को देखो, कितनी चतुराई से अलग हो गये।

🎋 पांच साल बाद 🎋

नौकरी बदलो, ओवर टाईम करो, डाका डालो, अब हमारे खरचे बढ़ गये हैं, पप्पू के खिलौने तक नहीं खरीद पाती, जबकि पप्पू की डिलिवरी तक मेरे मैके मे हुई है, यह कोई रिवाज है भला?

🎋छह साल बाद 🎋

ये मकान ठीक नहीं है, एक रूम कम पडता है।

🎋सात साल बाद 🎋

बच्चों के चक्कर में मुझे तो बिल्कुल भूल ही गये, पांच साल से एक अंगुठी तक नहीं दिलवाई।

🎋आठ साल बाद 🎋

नासिक वाले इंजिनियर ने कितने कितने चक्कर काटे थे, पर मुझे तो तुम्हारे साथ ही बर्बाद होना था।

🎋 नौ साल बाद 🎋

कोई अहसान नहीं करते हो, जो कमा कर खिलाते हो, सभी खिलाते हैं।

🎋दस साल बाद 🎋

बच्चों के नम्बर नहीं आये तो मैं क्या करूं ? अकेली दोनों को पढाती हूँ। तुम्हारे पास न तो टाइम है, ना इन्हे पढाने की अकल।

🎋ग्यारह साल बाद 🎋

खर्चा कम नहीं होगा, कमाई बढ़ाने की चिन्ता करो, और बाबूजी के पी.एफ. का क्या हुआ? मकान के वक्त तो कुछ दिया नहीं, अब जरा सी हेल्प नहीं कर सकते, या राम, भरत को ही देंगे, राजगद्दी?

🎋बारह साल बाद 🎋

मेरे पापा ने मेरी शादी की जिम्मेदारी ली थी, तुम्हारी बहन, भतीजियों की नहीं, शादियों में इतना वक्त दे रहे हैं, यह कम है क्या?

🎋तेरह साल बाद 🎋

ट्रान्सफर हो गया है तो मैं क्या करूं? मैं अपने बच्चों के साथ कहीं नही जाने वाली।

🎋चौदह साल बाद 🎋

क्या खाक मजा आया, बच्चे तो बोर हो गये, तुममें स्टेशन ढूंढने की भी तमीज नहीं है, और होटल भी क्या था.., धर्मशाला जैसा।

🎋पन्द्रह साल बाद 🎋

लौट आये ना? पहले ही कोशिश करते तो ट्रान्सफर होता ही नहीं, लेकिन तुममें इतनी स्मार्टनेस कहाँ है?

🎋सोलह साल बाद 🎋

बच्चे बड़े हो गये हैं, उनसे ढंग से बात किया करो, ये मेरा घर है, तुम्हारा दो टके का आफिस नहीं।

🎋सत्रह साल बाद 🎋

बच्चे घूमने चले गये तो कौन-सा पहाड टूट गया, सब जाते हैं। तुम्हारे भरोसे तो केवल सब्जीमंडी देख सकते हैं.., बात करते हो।

🎋अट्ठारह साल बाद 🎋

डाक्टर ने आराम करने को कहा है, पर मेरी जान तो घर का काम करते – करते ही निकल जायेगी।

🎋उन्नीस साल बाद 🎋

हो जाता है इस उम्र में, बिट्टो को समझा दिया है, अब वो देर रात तक बाहर नहीं रहेगी, पर तुम शुरू मत हो जाना।

🎋बीस साल बाद 🎋

मोटर साइकिल चलाएगा तो गिरेगा ही, पहले ही कहा था, कार दिला दो, तब तो बजट का रोना रो रहे थे।

🎋इक्कीस साल बाद 🎋

डायबिटीज हो गयी है तो मै क्या करूं ? जुबान पर तो लगाम है नहीं, तीन-तीन बार मीठा ठूंसते रहते हो, दवा लो ।

🎋बाइस साल बाद 🎋

ये गीता भाभी का इतना ध्यान क्यों रखते हो? इस उम्र में नाक कटवाओगे क्या?

🎋तेईस साल बाद 🎋

अपने भाईयों के साथ बिजनेस नहीं करोगे। बस एक नौकरी तो ठीक से होती नहीं.., बिजनेस करेंगे, वो भी शातिरों के साथ।

🎋चौबीस साल बाद 🎋

हाँ-हाँ, तो अपने बूते पर ही की है, अपनी बिट्टो की शादी, तुम्हारे परिवारवाले तो मेहमान बन कर आये थे, मेरा भाई नहीं आता तो लडकी की डोली तक नहीं उठती।

🎋पच्चीस साल बाद 🎋

रहने दो, काहे की सिल्वर जुबली, मेरा तो जिगर और फिगर दोनो खराब करके रख दिया तुमने। अच्छा मना लो, पर ज्यादा पटर-पटर मत करना और सब से गिफ्ट भी लेना, हमने भी पचासों जगह बांटी है।

🎋छब्बीस साल बाद 🎋

पढी – लिखी बहू है तो अपने ढंग से रहेगी ही, कानपुर वाली तो तुम बाप-बेटे को जमीं नहीं, अब भुगतो।

🎋सत्ताईस साल बाद 🎋

ससुर-नाना हो गये हो, ये फटे पाजामें में हाल में मत आया करो, मुझे शर्म आती है।

🎋अट्ठाईस साल बाद 🎋

तुम्हे जाना है तो जाओ, मै कहीं नहीं जाऊँगी, पोते को कौन सम्भालेगा? बहू में अक्ल है क्या?

🎋उन्तीस साल बाद 🎋

कोई मन्दिर-वन्दिर नहीं, तीस साल हो गये घंटियाँ बजाते, क्या दिया भगवान् ने, तंगी में ही जी रहे हैं न। 

🎋तीस साल बाद 🎋

देख लो, बीमारी में मैं ही काम आ रही है, बडा दम भरते थे भाई-भाभी का, कोई झांकने तक नहीं आया, चिल्लाओ मत, अभी खांसी शुरू हो जायेगी।

🎋इकत्तीस साल बाद 🎋

आपरेशन से पहले वी.आर एस ले लो, क्या पता बाद में नौकरी करने लायक रहो ना रहो?

🎋बत्तीस साल बाद 🎋

सुबह से हल्ला मत मचाया करो, पचास काम होते हैं घर में, मै तुम्हारी तरह रिटायर नहीं हूं, सुबह से शाम तक सबके लिये खटती हूँ।

🎋तैंतीस साल बाद 🎋

भैया आप तो इन्हें ले जाओ, सुबह से शाम तक सबका जीना हराम कर रखा है, परेशान हो गये हैं, क्या मुसीबत है?

🎋चौंतीस साल बाद 🎋

पप्पू, सारे पेपर अपने नाम करवाले बेटा, अब तेरे पापा का कोई भरोसा नहीं, तबीयत सम्भल भी गयी तो दिमाग की क्या गारंटी है?

🎋पैंतीस साल बाद 🎋

क्या कर रहे हो? कोई आ जाएगा। थोडी शर्म-वर्म है कि नहीं?

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अंत में..  पतियों के लिए..
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🌼जिस किसी भी पडाव में है, भुगतते रहे, कुढते रहे।
नमस्कार..! ;)😝😂

अर्थ का अनर्थ

कई दुकानदार अखबारों को काट कर लिफाफे बना लेते हैं…

पर कई दफा जोड़ लगाते समय दो अखबारों की खबरें इस तरह जुड़ जाती हैं कि उनके मतलब कुछ के कुछ और ही बन जाते हैं!

कुछ नमूनें देखें:

1. अमरीका के राष्ट्रपति….कानपुर के पास चोरी की भैंसों समेत गिरफ्तार!

2. अमरीकी फौजों द्वारा इराक की जेलों में….चमेली बाई के साथ भंगड़े की क्लासें 23 जुलाई से शुरू!

3. अफगानिस्तान की जेलों में छिपे लादिन को….पंजाब सरकार की ओर से बुढ़ापा पैन्शन देने का एलान!

3. मुख्यमंत्री के घर पर….भैंस ने छ: टाँगों वाले  बच्चे को जन्म दिया!

4. अपने हरमन प्यारे नेता को वोट डालकर….मर्दाना ताकत हासिल करें!

5. अटल बिहारी वाजपाई ने ज़ोर देकर कहा….एक सुन्दर और सुशील कन्या की ज़रूरत!

6. तिहाड़ जेल से छ: कैदी फरार….भारत को ओलंपिक्स में सोने के तमगे की उम्मीद!

7. क्या आपकी नज़र कमज़ोर है? आज ही आऐं….ठेका देशी शराब!

8. बेऔलाद दंपत्ति निराश न हों….7 तारीख को आ रहे हैं लालू प्रसाद आपके शहर में!!!
;)😆😜

जीवन की प्रार्थमिकता

किसी जंगल मे एक गर्भवती हिरणी थी जिसका प्रसव होने को ही था। उसने एक तेज धार वाली नदी के किनारे घनी झाड़ियों और घास के पास एक जगह देखी जो उसे प्रसव हेतु सुरक्षित स्थान लगा। अचानक उसे प्रसव पीड़ा शुरू होने लगी, लगभग उसी समय आसमान मे काले-काले बादल छा गए और घनघोर बिजली कड़कने लगी जिससे जंगल मे आग भड़क उठी। वो घबरा गयी उसने अपनी दायीं ओर देखा, लेकिन ये क्या?
वहां एक बहेलिया उसकी ओर तीर का निशाना लगाये हुए था, उसकी बाईं ओर भी एक शेर उस पर घात लगाये हुए उसकी ओर बढ़ रहा था अब वो हिरणी क्या करे?
वो तो प्रसव पीड़ा से गुजर रही है, अब क्या होगा? क्या वो सुरक्षित रह सकेगी? क्या वो अपने बच्चे को जन्म दे सकेगी? क्या वो नवजात सुरक्षित रहेगा? या सब कुछ जंगल की आग मे जल जायेगा? अगर इनसे बच भी गयी तो क्या वो बहेलिये के तीर से बच पायेगी? या क्या वो उस खूंखार शेर के पंजों की मार से दर्दनाक मौत मारी जाएगी – जो उसकी ओर बढ़ रहा है? उसके एक ओर जंगल की आग, दूसरी ओर तेज धार वाली बहती नदी, और सामने उत्पन्न सभी संकट.., अब वो क्या करे?
लेकिन फिर उसने अपना ध्यान अपने नवआगंतुक को जन्म देने की ओर केन्द्रित कर दिया। फिर जो हुआ वो आश्चर्यजनक था।
कड़कड़ाती बिजली की चमक से शिकारी की आँखों के सामने अँधेरा छा गया, और उसके हाथों से तीर चल गया और सीधे भूखे शेर को जा लगा। बादलों से तेज वर्षा होने लगी और जंगल की आग धीरे धीरे बुझ गयी। इसी बीच हिरणी ने एक स्वस्थ शावक को जन्म दिया।
ऐसा हमारी जिन्दगी में भी होता है, जब हम चारो ओर से समस्याओं से घिर जाते हैं, नकारात्मक विचार हमारे दिमाग को जकड़ लेते हैं, कोई संभावना दिखाई नहीं देती, हमें कोई एक उपाय करना होता है, उस समय कुछ विचार बहुत ही नकारात्मक होते है, जो हमें चिंता ग्रस्त कर कुछ सोचने समझने लायक नहीं छोड़ते। ऐसे मे हमें उस हिरणी से ये शिक्षा मिलती है की हमें अपनी प्राथमिकता की ओर देखना चाहिए, जिस प्रकार हिरणी ने सभी नकारात्मक परिस्तिथियाँ उत्पन्न होने पर भी अपनी प्राथमिकता “प्रसव”पर ध्यान केन्द्रित किया, जो उसकी पहली प्राथमिकता थी, बाकी तो मौत या जिन्दगी कुछ भी उसके हाथ में था ही नहीं, और उसकी कोई भी क्रिया या प्रतिक्रिया उसकी और गर्भस्थ शिशु की जान ले सकती थी! उसी प्रकार हमें भी अपनी प्राथमिकता की ओर ही ध्यान देना चाहिए। हम अपने आप से सवाल करें, हमारा उद्देश्य क्या है, हमारा फोकस अर्थात केंद्रबिन्दु क्या है? हमारा विश्वास, हमारी आशा कहाँ है, ऐसे ही मझधार मे फंसने पर हमें अपने इश्वर को याद करना चाहिए, उस पर विश्वास करना चाहिए जो की हमारे ह्रदय में ही बसा हुआ है.., जो हमारा सच्चा रखवाला, हितैषी और साथी है।

Don’t get hanged for a Comma…!

That freedom fighter was about to be hanged inside jail. The hangman was about to remove the thin plank of wood that was the difference between life and death for the convict. The convict was Indian, hangman was Indian but the order to hang was British government’s… yeah, this story pertains to the Indian freedom struggle era. With heavy heart the hangman went up to the lever that would have removed that plank of wood. Suddenly there was mild commotion from the entrance side.

“Wait, an important message is to be received through wire … Don’t hang him till we receive it.”

It was the British jailor. Hangman’s hands froze where they were. Everybody turned towards the jailor with an expectation… a hope that the convict might get freed… he might not get hanged at all! A moment later, an orderly came running with the wire just received. But, what was that…?! It contained just three words… “HANG NOT SPARE” Communication facility was not, what it is these days and after much deliberation jailor decided to go ahead with hanging as the meaning that he had deciphered from wire was “HANG, NOT SPARE” … off course he came to know about his folly afterwards! What to do… a freedom fighter that would have been set free lost his life just because of a ‘COMMA’!

The second story is from late Mughal period. Badshah Salamat had noticed that his Naib Wazir (Deputy Minister) was absent from his court. He asked his spies to find out the whereabouts of said Wazir. By evening the reply came. It was in Persian that used to be the script of day-to-day work those days. It said,

“او مرد امروز”

(Who Aaj Mar Gaya => He died today).” Badshah Salamat was shocked to hear that but a bigger shock was awaiting him when he came to know that the spy forgot to put “Pesh” (the accented hyphen that puts in the sound “E” at “Mar” and he actually meant to say (Woh Aajmer Gaya => He went to Aajmer).

So, you see, what a misplaced stoppage (Punctuation) can do to the meaning!

In late 17th century, people started placing a common “Shiro-Rekha” (शिरो-रेखा) on all words in a sentence in Hindi. Now, try and make meaning out of following sentence from a letter written in that period:-

“कागदहीकेकारणजानगवायो।

“KAGADHIKEKAARANJAANGAWAAYO”

What do you decipher? This question was put to a “Dhobi” (A Washer man) and he deciphered the meaning as:-

“का गदही के कारण जान गवायो।”

That is, somebody (Probably a washer man) lost his Donkey (गदही) and died due to loss to his income.

Not satisfied, people wanted to consult a “Munshi” (A Clerk, or a person with literary bent of mind) as they were approaching his house, his Milkman happened to come across. Curious, he too wanted to see the letter and after seeing he couldn’t but ridicule them for not understanding a line that was very simple and obvious. It meant, according to him:-

काग दही के कारण जान गवायो।

A crow lost life for curd… (After being hit by the stone thrown by milk-woman to scare him away from the pitcher full of curd, probably …!)

People were aghast at the explanation. Suddenly, somebody noticed the Munshi coming their way. They just ran up to him with the problem at hand. The bespectacled Munshi, adjusting his specs, announced to the crowd, “Meaning is quite obvious… Someone lost very important paper and lost his life because of the urgency associated! You see…

कागद ही के कारण जान गवायो।

Till date it is not clear why someone lost his life or, what the meaning of that sentence is…! Everybody explains it according to his wisdom, his profession, his familiarity with one or other situation. So, you too don’t lose a life (Your or someone else’s) just for a silly punctuation… A Comma!

Now something deeply philosophical: –

“A Punctuation or A Stoppage, as in literature, is very important in life too, for it gives you to time to stop for a while, look around, look back, rejuvenate yourself… and then go ahead.” Think about this.

I know what you are thinking…!

“So much for your philosophies… Huuh!”

Ok, forget it!

मुसद्दी लाल की गवाही (SKIT FOR SEWAK DAY 2010)

Mussaddi lal ki gawah

courtroom i

CAST:

  1. जज
  2. वकील
  3. गवाह

SCENE 1: COURTROOM: INTERNAL: DAY

सुत्रधार:

आप में से कई लोग कचहरी जातें हैं .. अपने केस मुकदमे के चक्कर में! कुछ लोग जज हैं .. कुछ वकील हैं, वे भी कचहरी जातें हैं .. पर कुछ ऐसे भी लोग हैं जो ना जज हैं ना वकील फिर भी उनका कचहरी में आना जाना लगा रहता है। उन्ही में से एक हैं हमारे मुसद्दी लाल .. एक प्रोफेशनल गवाह! काफी नामी गवाह हैं .. उनकी गवाही सुनने के लिये काफी भीड़ भी जम जाती है। काफ़ी किस्से मशहूर हैं उनके हमारे यहां .. अब आपको उनके किस-किस किस्सों के बारे में बतायें .. आप खुद ही देख लिजिये ..

इस एकांकी में गवाह मुसद्दी लाल का रोल …………………… निभा रहें हैं, वकील के रोल में हैं ……………….., और मेरा क्या रोल है, ये आप खुद ही देख लिजिये!

SCENE 2: COURTROOM: INTERNAL: DAY

सुत्रधार ही जज की कुर्सी पर बैठा है। आवाज आती है – मुसद्दी लाल हाजिर हो .. ! मुसद्दी लाल हाथ में कटहरा उठाये अदालत में दाखिल होता है।

मुसद्दी लाल:

बहुत गवाही देने जाना पड़ता है ना, इसलिये कटहरा अपने साथ ही लेकर चलता हुँ।

(फिर जज की ओर देख कर)

नमस्कार जज साब .. अएं, आप नये आये हैं का जज साब, पाठक जी थें ना आप से पहले? अच्छा घूंस लेने के कारण डिस्मिस विस्मिस हो गये होंगे, पाठक जी .. कितना मना किया था, साहब को!

वकील:

ठीक है .. ठीक है .., पहले आप गीता पर हाथ रख कर ..

मुसद्दी लाल:

(बीच में टोकता हुआ)

साब, ये गीता कहां? ये तो BRO का File है!

वकील:

ठीक है .. ठीक है, आप इसी पर हाथ रख कर कसम खाइये कि जो भी कहेंगे सच कहेंगे और सच के सिवा कुछ भी नही कहेंगे।

मुसद्दी लाल:

(जज की तरफ मुड़कर)

लो, सुनो ..! ये ऐसे ही बात हो गयी .. हमरे गांव मे एक रहा कलुवा .. अ एक ठो रही उसकी भैंस .. अ उसकी भैंस को हुआ एगो भैंसा ..

वकील:

(बीच में)

अब .., कलुवा और उसकी भैंस का इस शपथ से क्या संबंध?

मुसद्दी लाल:

जो सुना रहे है वो तो सुनो ना ..!

(जज की तरफ मुड़कर)

जज साब,जब भैंस को हुआ भैंसा, तो हमको मिल गया बाबू .. हम बोला, ए बाबू, कलुवा के भैंस को हुआ है एगो भैंसा .. तो जानते हैं का बोला?

जज प्रश्नवाचक अंदाज मे देखता है

मुसद्दी लाल:

बोला .. का हो, कलुवा का भैंस पेट से था का? अब आप बताओ, बिना पेट से हुये भी का भैंसा हो सकता है? आप पढ़े लिखे लोग भी ना .. जाने का बात करत हो! अरे ऐसे ही, जब हम सच बोलेंगे ही तो सच के सिवा और का बोलेंगे .. मतबल है कोइ इस बात का .. बताओ तो जरा?

वकील:

कानून है .., शपथ लो!

मुसद्दी लाल:

हां तो ठीक है, हम कोई कानून के बाहर थोड़े ही हैं .. लाइये हम शपथ लेते है।

(जज की ओर देख कर शपथ लेता है)

मैं जज साहब और ईश्वर को हाजिर-नाजिर जान कर शपथ लेता हुँ कि जो भी कहुंगा सच कहुंगा और, सच के सिवा कुछ भी नही कहुंगा।

(फिर वकील की ओर मुड़कर)

वैसे हमरी ये बात आप भी जान लो, सात पुस्तों में से भी आजतक किसी ने झूठ नही बोला है .. सबसे बड़ा सच तो यही है!

वकील:

अच्छा ठीक है ठीक है, ये बताओ, नाम क्या है?

मुसद्दी लाल:

किसका?

वकील:

अब यहां क्या आपको गांव के लोगों के नाम पूछने के लिये बुलाया है ..अपना नाम बताइये!

मुसद्दी लाल:

मुझे लगा के आप जज साब का नाम पूछ रहें हैं के ..(दर्शकों की ओर इशारा करके) इनका नाम पूछ रहें हैं के, उनका नाम पूछ रहें हैं!

वकील:

आप अपना नाम बताइये।

मुसद्दी लाल:

(जज की ओर इशारा करता हुआ)

जज साहब, ये पाठक जी कहां गये आपको मालूम है का? उनके एक रिश्तेदार के केस में भी हम ही गवाह हैं।

जज:

आप से जो सवाल किया जा रहा है सिर्फ उसका जबाव दें- अपना नाम बतायें।

मुसद्दी लाल:

हुजूर माई बाप, नाम का तो ऐसा है .. मां बाप ने तो रखा था .. छोड़ें साहब, गांव में तो जो मिल जाता है हमको कहता है – माधोलाल, तो कोई कहता है माधो भइया, तो कोई माधो मियां .. माधो भाईजान .. कोई-कोई तो ..

वकील:

ओह्हो, आप एक नाम बताइये।

मुसद्दी लाल:

नाम लिखना है तो लिख लिजिये .. मुसद्दी लाल .. ला लड़की का!

जज:

(टेबल पर हथौड़ा बजाते हुए)

आर्डर-आर्डर, क्या आप उनको (वकील की ओर इशारा करके)वर्णमाला सिखायेंगे?

मुसद्दी लाल:

नहीं-नहीं जज साब, क्या है ना कई बार गलती हो जाती है सुनने में ना .. फिर वकील साब तो अपने पुराने आदमी हैं ..।

वकील:

बस-बस ठीक है, बाप का नाम बताइये।

मुसद्दी लाल:

साब, हमारे यहां बाप का नाम जुबान पर नही लातें हैं।

वकील:

क्युं? क्या शर्म आती है?

मुसद्दी लाल:

(भड़क कर)

शरम काहे को आयेगी? आप को आती है क्या बाप का नाम लेने में? लिखिये .. हरि लाल पहलवान .. हरि लाल पहलवान .. हा हाथी वाला!

वकील:

अपनी उम्र बताइये।

मुसद्दी लाल:

का ..? काहे बताबें? कोई शादि-ब्याह करवाना है का?

वकील:

ओह, आप अपनी उम्र बताइये।

मुसद्दी लाल:

हुजूर, मैं जैसा हुं .. बूढ़ा हुं .. जवान हुं, आप के सामने हुं .., बस! आपको जैसा लगे, लिख लिजिये। इसी में अदालत का टाईम निकल जायेगा!

जज:

(वकील से)

आप ये सब क्यों पूछना चाहतें है?

वकील:

सर, मैं तो बस इनकी आईडेन्टिटी इस्टैब्लिश करना चाह रहा हुँ।

जज:

ठीक है, अब मेन मुद्दे पर आइये।

वकील:

ठीक है सर, बस एक और सवाल ..

(मुसद्दी लाल से)

क्या आप जेल जा चुके हैं?

मुसद्दी लाल:

जेल ..? अरे, जेल जाना कोई खराब बात है का? महात्मा गांधी भी तो गये थें जेल .. नमक बनाने के लिये!

वकील:

और .. आप किस लिये गये थे जेल?

मुसद्दी लाल:

दारू बनाने के लिये ..!

वकील:

दारू ..? क्या आपको मालूम नहीं, नागालैंड में दारू बनाना गैरकानूनी है?

मुसद्दी लाल:

उस टाईम में तो नमक बनाना भी उतना ही गैरकानूनी था .. गांधी बाबा से क्यूं नही पूछते है .. बड़ा आदमी थें, इसलिये क्या?

जज:

(वकील से)

आप क्यों ये सवाल पूछ रहें हैं?

वकील:

साहब, मैं अदालत के सामने ये तथ्य लाना चाहता हुं कि ये आदमी झूठी गवाही देने के आरोप में भी जेल जा चुका है।

मुसद्दी लाल:

अरे, ऐसी छोटी-मोटी बातें मुझे याद नही।

वकील:

छोटी-मोटी बातें?

मुसद्दी लाल:

हां, और नही तो क्या?

जज:

(मुसद्दी लाल से)

क्या आप अपनी सफायी में कुछ कहना चाहतें है?

मुसद्दी लाल:

सफायी के बारे में ..?

जज:

हां, सफायी के बारे में ..!

मुसद्दी लाल:

जज साब, मैं बहुत सफायीपसंद इंसान हुं .. दिन में दो बार नहाता हुं .. सफायी के लिये .. लक्स साबुन से, कभी लाइफबॉय से, कभी पीयर्स से, कभी हमाम से, तो कभी ..

जज:

मैने आपसे इस मसले पर सफायी के बारे मे पुछा था!

मुसद्दी लाल:

साहब, मैं तो हमेशा साफ-सुथरा रहता हुं .. आप मुझे सुंघ कर देखिये ना .. कोई बदबू नहीं ..!

जज:

(वकील से)

आप गवाह से इस मामले के संबंध में सवाल पूछिये।

वकील:

ठीक है, जज साहब

(मुसद्दी लाल से)

आप लालू को जानते हैं?

मुसद्दी लाल:

कौन .. यादव? चीफ मिनिस्टर रह चुके हैं, बिहार के ..!

वकील:

मैं लालूराम की बात कर रहा हुं .. आप के गांव का लालूराम .. आपका पड़ोसी!

मुसद्दी लाल:

हां साहब, हम तो खूब जानत रहें .. उ लालूराम के .. अरे, लंगोटिया दोस्ती जो रही!

वकील:

अच्छा, तो ये बताइये, लालू राम की उम्र क्या होगी?

मुसद्दी लाल:

अरे साहब, जब बताया की हमरे दोस्त रहें है तो ये उमर-बीम्मर क्या है .. कोई एतना सोंच के दोस्ती थोड़े करता है?

वकील:

आप सिर्फ इतना बतायें कि आप लालूराम को जानते है या नहीं।

मुसद्दी लाल:

बिल्कुल जानते है साहब, जैसे कंपुटर मे करंट होता है .. जैसे कलम में स्याही होता है .. जैसे समोसे मे आलू होता है, वैसे ही हमरे दिल मे वो है ..

वकील:

(बीच में)

फिर आप उनकी उम्र क्यों नही बता रहे है ..? बताइये।

मुसद्दी लाल:

उनकी उम्र .. लिखिये .. यही कोई ३० ..

वकील:

३० साल ..?

मुसद्दी लाल:

३० से ६० साल के बीच है ..!

वकील:

ये कौन सी उम्र है .. ३० से ६० साल के बीच?

मुसद्दी लाल:

अब हम कोई उनके छट्ठी मे भोज तो खाय नही रहें .. जो एकदम सही-सही ही बता पायें! जो बता रहें है सो लिख लो, ना तो खुदई पूछ लेना!

वकील:

अच्छा, आप ये बताइये उनका कद कैसा है .. लंबे है या नाटे?

मुसद्दी लाल:

है तो लंबे ..

वकील:

अच्छा, लंबे है?!

मुसद्दी लाल:

हां, लंबे है .. लेकिन ..

वकील:

लेकिन क्या?

मुसद्दी लाल:

लेकिन ये कि उनको बहुत जोर का दमा है .. तो थोड़ा झुक कर चलते है .. (झुक कर दिखाता है) इसलिये लगते नाटे ही है .. !

वकील:

(हक्का-वक्का होकर)

है ..? अच्छा उनका रंग कैसा है .. गोरा या काला?

मुसद्दी लाल:

साहब .., हैं तो गोरे ही ..

वकील:

अच्छा, गोरे है ..?

मुसद्दी लाल:

हां, गोरे है .., लेकिन ..

वकील:

अब लेकिन क्या?

मुसद्दी लाल:

साहब हमने सच बोलने की कसम खायी है .. तो, कहेंगे तो सच ही! लालूराम को, बताया ना, बड़े जोर का दमा है .. सो चेहरा कुम्हला गया है .. देख कर कोई बता नही सकता के गोरे है या काले!

वकील:

लालूराम के बाल कैसे हैं .. सफेद या ..

मुसद्दी लाल:

सफेद है, साब ..

वकील:

अच्छा, सफेद है ..!

मुसद्दी लाल:

हां, हैं तो सफेद ही .., लेकिन ..

वकील:

अब, लेकिन क्या?

मुसद्दी लाल:

साब, आजकल बाल कौन नही काले करता है .. सो वो भी कभी-कभी अपने बाल काले कर लेता है।

जज:

मुसद्दी लाल गवाह, आपको अदालत निर्देश देती है कि उल-जुलूल बातों से अदालत और अपना वक्त जाया न करें।

मुसद्दी लाल:

हुजुर, उल-जुलूल कहां ..? मैं तो सच बता रहा हुं और सच के सिवा कुछ भी नही .. कसम भगवान की!

वकील:

अच्छा, आप मुन्नू मियां को जानते हैं?

मुसद्दी लाल:

हां साहब, जैसे लालूराम को जानते है, वैसे ही ..

वकील:

थोड़ा विस्तार से बताये, मुन्नू मियां को कैसे जानते है?

मुसद्दी लाल:

बड़ा लालची है साहब, जब देखो तब हमरे बैठक में ही पड़ा रहता है .. पान-तमाखू के लिये! मुफतखोरी की आदत है ना साहब .. मुफत मे तो गोबर भी खिलाओ तो खा ले!

वकील:

अच्छा, मुन्नू मियां का कद कैसा है?

मुसद्दी लाल:

कद माने .. लंबाई?

वकील:

हां .. हां।

मुसद्दी लाल:

मुन्नू मियां का कद होगा .. यही कोई (हथेली नीचे की तरफ करके हाथ उपर-नीचे करता है)

वकील:

कितना ..?

मुसद्दी लाल:

इतना ..

(कंधे के बराबर हाथ रोक कर)

अ .. हां।

वकील:

(जज की ओर मुड़कर)

नोट किया जाये योर ऑनर, ये आदमी अदालत मे झूठ बोल रहा है .. जिस मुन्नू मियां का कद ये इतना बता रहा है, वो आदमी नहीं, मुर्गा है ..!

मुसद्दी लाल:

(हड़बड़ाकर, जज से )

अयं .., मुर्गा है? अभी रुकिये जज साहब .. झूठ कहां .. अभी दुसरा हाथ लगाया कहां है?

(दुसरा हाथ पहले हाथ के करीब ६ इंच नीचे लगा कर)

इतना .. मैं तो इतना ही कह रहा हुं .. ये वकील साहब सुनते ही नही हैं।

वकील:

आप सच बतायें वारदात के वक्त आप वहां थे या नही?

मुसद्दी लाल:

लो सुनो, हम काहे नही होंगे .. अरे हमरा तो काम ही है वारदात के वक्त खड़े होने का .. (फिर अपनी बात पर ही चौंक कर) मतबल .. किसी से भी पूछ लो .. हम तो वहीं थे। अब कोई घड़ी-घोड़ा तो है नहीं हम गरीबों के पास के आपको टाईम भी बता दें कि हां इतने बजे हम वहां खड़े थें और इतने बजे की वारदात है!

वकील:

ठीक है, वारदात के बारे में जो भी मालूम है वो अदालत को बताये।

मुसद्दी लाल:

(जज की ओर मुड़कर)

साहब हमरे गांव का सूरज डुबने ही वाला था ..।

वकील:

अब आपके गांव में क्या कोई निराला सूरज उगता है .. ये बताइये दिन था या रात?

मुसद्दी लाल:

(जज से)

जज साब, ये बताइये, हमरे गांव मे अगर सूरज डुब गया तो का सारे संसार मे सूरज डूब जाता है? कल को बगल गांव वाला कोई आकर अगर बता दे कि वहां सूरज नही डूबा था तो इ वकील साहब तो हमको झूठ बोलने के आरोप में जेल भिजवा देंगे ना .. ?

(फिर वकील की तरफ मुड़कर)

का वकील साहब .. है ना जायज बात? आप कल ये भी पूछ सकते है .. सूरज तुमरे ही गांव में क्यों डूबा? अरे, वो कोई हमरे मर्जी से चढ़ता गिरता है ..? वो तो होता ही रहता है .. कभी चढ़ता है कभी गिरता है! इसिलिये तो कहा है .. सुनिये:-

पर्वत से गिर कर भी संभल सकता है कोई,

नजर से जो गिर जाये उसको संभालेगा कौन?

मुसद्दी लाल अपनी बात पर खुद ही खूश होता हुआ जज की ओर देखता है।

जज:

आप शायरी छोड़िये और वकील साहब की बात का जबाव दिजिये।

मुसद्दी लाल:

(निराश होकर)

साहब, बुरा ना माने तो एक बात बोलूं .. पाठक जी ज्यादा अच्छे थें .. शेरो-शायरी में भी दखल रखतें थें।

वकील:

ये जो आरोप है लालूराम पर कि उसने अंतिम नागा का पिटायी किया है, इसके बारे में आप का क्या कहना है?

मुसद्दी लाल:

हम तो लड़ाई-झगड़े से कोसो दूर रहतें है साहब, हम क्या बता सकते है!

वकील:

तो आप मानते है, वारदात के वक्त वहां आप नही थें?

मुसद्दी लाल:

नही, हम तो वहीं थे!

(वकील की ओर देख कर सर हिला-हिला कर बोलता हुआ)

शपथ खाया है साहब, झूठ नहीं ना बोलेंगे! हमरे आगे भी दु लोग था और पीछे भी दु लोग .. बताइये कितना लोग था .. अब ऐसे में जो दिखा वोही तो बताएंगे ना आपको!

वकील:

ये जो चीखने की आवाज आयी थी, वो किस दिशा से आयी थी?

मुसद्दी लाल:

दिशा .. ? गरीबों की भी कोई दिशा होती है साहब? आप ही बताइये कि हमरे गांव में रात के अंधेरे में अगर कोई कुत्ता भूंकता है ..

(कुत्ते की आवाज निकालता है)

भूं ऽ भूं .., तो बताइये, वो आवाज किस दिशा से आती है?

जज अब कुर्सी से उठकर सुत्रधार की भूमिका मे (पीछे वकील और गवाह धीमी आवाज में जिरह करते रहते है)

जज:

बहूत सवाल किये वकील ने और हमारे रणबांकुरे मुसद्दी लाल भी डटे रहे। उसने वो जबाव दिये .. वो जबाव दिये कि मामला सुलझने की बजाय और उलझ गया, और आगे वही हुआ जो होता आया है …।

SCENE 3: COURTLROOM: INTERNAL: DAY

जज:

(टेबल पर हथौड़ा मारते हुए)

ऑर्डर-ऑर्डर, गवाह की गवाही और वकील की जिरह सुनकर अदालत अभी किसी भी नतीजे तक नही पहुंच पायी है इसलिये इस मुकद्दमे की कार्रवायी अगले सेवक डे तक के लिये मुल्तवी की जाती है।

मुसद्दी लाल:

(वकील की तरफ देख कर)

लो हो गया मुल्तवी, अरे हमको तो अगला डेट ही चाहिये था .. आप काहे इतना अनाप-शनाप सवाल पूछे जा रहे थे।

(फिर पॉकेट मे हाथ डालते हुये)

ए हुजूर आपके पास पाँच सौ का छुट्टा है का?

वकील:

किस लिये?

मुसद्दी लाल:

अरे लालूराम को वापस करना है .. सौ रुपया! हमरा फीस चारे सौ फी गवाही है ना .., जरुरत पड़े तो कभी आप भी याद किजियेगा साहब .. इस मुसद्दीलाल गवाह को ..!

पर्दा गिरता है।

SCHOOL INSPECTION (HINDI SKIT-FOR SEWAK DAY)

ACT I

Scene 1:INT: क्लासरुम

‘सेवक पाठशाला’लिखा बैनर दीवार पर लगा है, साइड में वर्ल्ड मैप लगा है। एक टेबल पर रजिस्टर और छड़ी रखी है, एक कुर्सी भी साथ में रखी है। बच्चे शोरगुल कर रहें हैं।

मास्टर एक हाथ में किताब लेकर लंगड़ाते हुए दाखिल होता है।

मास्टर:- ऐ … शांत रहो।

बच्चे:- गुड मार्निंग सर।

मास्टर:- गुड मार्निंग।

(मास्टर जैसे ही कुर्सी पर बैठने की कोशिश करता है, एक लड़का कुर्सी खींच लेता है जिससे मास्टर गिर जाता है।)

मास्टर:- (डांट लगाते हुए) तुं मुर्ख है क्या? (टेबल से छड़ी उठाकर पीठ पर बजाते हुए) चल कान पकड़!

(लड़का मास्टर के कान की तरफ हाथ बढ़ाता है।)

मास्टर:- (डांटते हुए) अबे, मेरे नही, अपनें कान पकड़!

(लड़का अपने कान पकड़ लेता है। मास्टर कुर्सी पर बैठ कर रजिस्टर खोलता है और हाजिरी लेना शुरू करता है।)

– होशियार सिंह

– यस सर

– अमरीक सिंह

– जी, सर

– फुलतुड़ु सिंह

– हाजिर श्रीमान

– तोता राम

– जी सर

– रलिया राम

– उपस्थित श्रीमान

मास्टर:- रलिया, तुं कल स्कूल क्यों नही आया था?

रलिया:- मास्टर साब, कल मैं गिर पड़ा था, लग गयी थी।

मास्टर:- कहाँ गिर पड़ा था, … क्या लग गयी थी?

रलिया:- मास्टर साब, बिस्तर पर गिर पड़ा था, नींद लग गयी थी।

मास्टर:- (छड़ी लगाते हुए) हप! … बैठ।

(रलिया बैठ जाता है।)

मास्टर:- ठीक है बच्चों, सब शांत होकर बैठो और मेरी बात सुनो।

बच्चे:- यस सर/ जी सर।

मास्टर:- कल स्कूल इंस्पेक्टर यहाँ आएगा, आप खुराफात थोड़ा कम करना और वो जो सवाल पुछे उसका जबाव ठीक-ठीक देना।

बच्चे:- जी सर।

मास्टर:- और सुनो, कल होशियार सिंह और अमरीक सिंह यहाँ नही आएंगे।

(होशियार सिंह और अमरीक सिंह पीछे खुसर-पुसर करतें है।)

होशियार सिंह:- चल बे, कल हमारी छुट्टी।

अमरीक सिंह:- ना-ना, आना तो पड़ेगा, क्या पता कल मिठाई बटे यहाँ और मास्टर हमारा हिस्सा मार ले।

होशियार सिंह:- ठीक है यार, हम चुपचाप आकर पीछे बैठ जाएंगे।

– पर्दा गिरता है

Scene 2: INT: क्लासरुम

घंटी की आवाज के साथ पर्दा खुलता है। बच्चे शोरगुल कर रहे हैं। स्कूल इंस्पेक्टर का प्रवेश।

स्कूल इंस्पेक्टर:- शांत,… बच्चों। … मास्टर साहब कहाँ हैं?

फुलतुड़ु सिंह:- … सर, … कोई आने वाला है, मास्टर साब दारु लाने गयें हैं।

स्कूल इंस्पेक्टर:- है? … क्या स्कूल है! … दारु?

बच्चे:- जी सर।

स्कूल इंस्पेक्टर:- अच्छा, आप लोग शांत हो जाओ। मैं कुछ सवाल पुछुंगा, आप उनके जबाव दो।

बच्चे:- यस सर!

स्कूल इंस्पेक्टर:- अच्छा ये बताओ आपमें होशियार कौन है?

रलिया:- सर, होशियार मैं हुँ। मैं क्लास में फर्स्ट आता हुँ।

होशियार सिंह:- (शर्ट खींच कर बैठाते हुए) ऐ बैठ। सर, होशियार तो मैं हुँ, मेरा नाम होशियार सिंह है।

स्कूल इंस्पेक्टर:- अच्छा अच्छा! (छड़ी से मैप की तरफ इशारा करते हुए) आप बताओ – अमरीका कहाँ है?

होशियार सिंह:- सर, … अमरीका? … वो तो बाथरुम में छिपा है .., इधर आया ही नही।

स्कूल इंस्पेक्टर:- हैं .. ? (छड़ी टेबल पर पटकते हुए) अच्छा ठीक है, तुम बैठो।

स्कूल इंस्पेक्टर (फुलतुड़ु कि ओर मुड़कर):- अच्छा बेटे, आप खड़े होकर बताओ, आप बड़े होकर क्या करोगे?

फुलतुड़ु (खड़ा होकर):- सर, शादी।

स्कूल इंस्पेक्टर:- नही .. नही, मेरा मतलब है, बड़े होकर क्या बनोगे?

फुलतुड़ु:- दुल्हा बनुंगा।

स्कूल इंस्पेक्टर (खीज कर):- ओहो, I mean to say तुम बड़े होकर क्या हासिल करना चाहते हो?

फुलतुड़ु:- सर, दुल्हन!

स्कूल इंस्पेक्टर (गुस्से से):- अबे, मतलब बड़े होकर मम्मी-पापा के लिये क्या करोगे?

फुलतुड़ु:- बहू लाउंगा, और क्या?

स्कूल इंस्पेक्टर (अब चीखते हुए):- हरामखोर, तुम्हारे मां-बाप तुम से क्या चाहते है?

फुलतुड़ु (हकलाते हुए):- प .. पोता।

स्कूल इंस्पेक्टर (सर के बाल नोचता हुआ):- हे भगवान .., अबे जिन्दगी का क्या मकसद है?

फुलतुड़ु सिंह (दो अंगुलि दिखाते हुए):- सर, हम दो हमारे दो .. ।

स्कूल इंस्पेक्टर (गुस्से से पागल होता हुआ):- अबे .., बैठ .. बैठ .., बैठ जा तूं।

फुलतुड़ु सिंह (बुदबुदाता हुआ):- मैं तो बैठा ही था, आपने ही तो खड़ा किया मुझे।

(तभी मास्टर हड़बड़ाते हुए क्लास में दाखिल होता है।)

स्कूल इंस्पेक्टर:- जी, आप कौन हैं?

मास्टर:- जी .. जी, मैं .. मै, इस क्लास का चीटर हुँ।

स्कूल इंस्पेक्टर:- अच्छा, आप टीचर हैं! क्या पढ़ाया है आपने इन्हे? इनका डिस्सीप्लिन भी ठीक नही है।

मास्टर:- नहीं सर, ये तो बहुत अच्छे बच्चे हैं। सारा कुछ जानते हैं। इनका सिलेबस भी कंप्लीट है। आप पुछिये, सर!

स्कूल इंस्पेक्टर:- (रलिया की तरफ ईशारा करते हुए) अच्छा आप बताओ, द्रौपदी का चीरहरण किसने किया था?

(रलिया चुपचाप सर नीचे झुका लेता है।)

मास्टर:- हाँ-हाँ, बताओ रलिया बेटे, द्रौपदी की साड़ी किसने खींची थी?

रलिया:- (स्कूल इंस्पेक्टर की तरफ देखता है फिर सर नीचे झुकाते हुए कहता है) सर, पिता जी ने!

मास्टर:- क्या बोलता है?

रलिया:- सर, द्रौपदी मेरी माँ का नाम है।

स्कूल इंस्पेक्टर:- अच्छा!? (मास्टर की ओर आश्चर्य से देखते हुए लड़के को बैठने का ईशारा करता है।) बैठो!

(फिर तोताराम की तरफ ईशारा करते हुए) अच्छा ये बताओ, शिव जी का धनुष किसने तोड़ा?

तोताराम:- धनुष? (आश्चर्य से) .. क्या मालूम! हम तो स्कूल आए ही नही थें, .. छुट्टी पर थें, सर!

स्कूल इंस्पेक्टर:- (होशियार की ओर ईशारा करते हुए) तुम बताओ, क्या जानते हो?

होशियार सिंह (रुँआसा होकर):- मैं कुछ नही जानता, सर! मैं तो सबसे सीधा हुँ, मैनें धनुष देखा भी नही! ये तो हर चीज में युँ ही मेरा नाम लगा देतें हैं।

स्कूल इंस्पेक्टर:- क्या मास्टर साहब? बच्चे तो कुछ जानते ही नहीं!

मास्टर:- सर, बच्चे है, टुट गया होगा गलती से। कुछ ले-दे कर फिक्स कर लेंगे, सर। चलिये ना, कुछ पीने-खाने का भी इंतजाम किया हुआ है। बच्चे भी आपके लिए कुछ लेकर आए हैं, सर।

स्कूल इंस्पेक्टर:- आप मुझे रिश्वत देना चाहते हैं?

मास्टर:- नहीं सर, ये तो प्यार है जो हम आपके साथ बाँटना चाहते हैं!

(एक बच्चे को देने का ईशारा करता है।) दे ना!

(बच्चा उठकर एक बरतन स्कूल इंस्पेक्टर को पकड़ा देता है।)

सर, आपके लिए।

स्कूल इंस्पेक्टर:- क्या है ये?

बच्चा:- दूध है, सर।

(स्कूल इंस्पेक्टर डब्बा लेकर पीना शुरू करता है, पर मुँह लगाते ही थू-थू करने लगता है।)

स्कूल इंस्पेक्टर:- ये दूध है? .. कहाँ से लेकर आया है?

बच्चा:- सर, रात में बिल्ली आधा दूध पी गयी थी, माँ ने कहा – बांकी फेंक मत, मास्टर साब के लिए ले जा – उसको क्या पता बिल्ली का जूठा है!

(स्कूल इंस्पेक्टर डब्बा नीचे गिरा देता है।)

मास्टर:- अरे, तुँ मेरे लिये जूठा दूध लेकर आया था!

(मास्टर लात मार कर डब्बे को फेंक देता है। बच्चा इसपर जोर से रोने लगता है।)

स्कूल इंस्पेक्टर:- क्यों रो रहा है अब, चुप हो जा?

बच्चा (सुबकते हुए):- सर, मेरा छोटा भाई रात को इसी डब्बे मे पेशाब करता था, आपने फेंक दिया, अब किसमें करेगा?

स्कूल इंस्पेक्टर (हिकारत से):- क्या .., इसी डब्बे में?

मास्टर:- सर, बच्चे हैं सर! … नासमझ हैं, इनकी कोई गलती नही।

स्कूल इंस्पेक्टर:- हां-हां, गलती तो आपकी है जो आप बच्चों को पढ़ाने कि बजाय उनके घर से सामान मंगवाते रहते हैं। गलती हमारी भी है कि हमने आप जैसे शिक्षक बहाल कर रखे है इन नौनिहालों के लिये!

मास्टर:- आप गलत समझ रहे हैं, सर! ऐसा कुछ भी नही है! आइये ना, मिल बैठ कर सेट्टल कर लेते है यहीं पर!

स्कूल इंस्पेक्टर:- बहुत खराब माहौल है, मै इसकी कंप्लेन शिक्षा मंत्री तक करुंगा।

मास्टर:- अजीब अहमक हैं! देखते है क्या कर लेते है आप भी! शिक्षा मंत्री तो मेरे जीजा का साला है! जाइये जरुर किजीये! कहाँ-कहाँ से चले आते है, सब!

– पर्दा गिरता है

Scene 3: INT: शिक्षा मंत्री का दफ्तर

शिक्षा मंत्री कुर्सी पर बैठा पान चबा रहा है। स्कूल इंस्पेक्टर पास में खड़ा है। मंत्री ईशारा करता है, एक अर्दली थूकदान लेकर आता है।

शिक्षा मंत्री (थूकदान में पीक थूक कर):- हुँ .. !

स्कूल इंस्पेक्टर:- बहुत खराब हालत है सरकार!

शिक्षा मंत्री:- आतो .., बैठिये ना पहिले!

स्कूल इंस्पेक्टर:- सर, मै तो हक्का-बक्का हुँ, बच्चों को ये तक मालूम नही कि शिव का धनुष किसने तोड़ा!

शिक्षा मंत्री:- हुँ!

(अर्दली को आवाज लगाकर)

ऐ .., जरा पीए साहब को बुलाना, स्कूल को पीछले तीन साल में क्या-क्या ईशु हुआ, उसका लिस्ट लेकर आयेगा।

(पीए लिस्ट लेकर आता है।)

पीए:- सर, ये रहा लिस्ट!

शिक्षा मंत्री:- हाँ, तो पढ़िये ना .. क्या-क्या ईशु हुआ है? अभी हम दुध का दुध और पानी का पानी कर देते है!

पीए:- सर, टेबल, कुर्सी, पिढ़िया, ब्लैक बोर्ड, खल्ली ..।

शिक्षा मंत्री:- हप! अरे, इसमे शिव का धनुष है का?

पीए:- नही सर, इसमे तो शिव का धनुष है ही नही!

शिक्षा मंत्री:- लो .., देखो! (स्कूल इंस्पेक्टर की तरफ देखते हुए) का जी? यही सब गलत-सलत बात पुछते है, बच्चा सब से?

स्कूल इंस्पेक्टर:- सर .. ?

शिक्षा मंत्री:- हप .. ! अरे, जब इशुए नही हुआ है तो तोड़ेगा कौन? ऐसेही मास्टर को भी बुरा-भला कहता है ..! अरे, ऊ तो हमरे साले का जीजा है! … तुम ऐसे ही इतना कह रहा था!

स्कूल इंस्पेक्टर:- सर, गलती हो गयी।

शिक्षा मंत्री:- का गलती हो गयी .. ? अरे जब शिव का धनुष हम इशुए नही किये त उसको तोड़ेगा कौन .. ? सेवक पाठशाला को भी बदनाम करता है, नौकरिए हम ले लेंगे .. !

स्कूल इंस्पेक्टर:- (घबरा कर) नह .. नही सर!

(शिक्षा मंत्री के पांव पर गिरने लगता है।)

शिक्षा मंत्री:- हप .. ! हप .. !!  हप .. !!!

– पर्दा गिरता है!