Self Worth

A motivitional guru pulls out a five hundred rupee note, in a meeting with his disciples, and hold it up for all to see.

He just asked a simple question. “How much is this worth?”

“Five Hundred rupees!” the crowd yelled in unison.

“Right,” said the speaker.

He then took the note and crumpled it into a ball and asked “How much is it worth now?”

“Five Hundred rupees!” screamed the audience.

He then threw the note on the ground, stamped all over it and picked up the note and asked one more time: “And how much is it worth now?”

“Five Hundred rupees!” was the response.

“I want you to remember this,” said the speaker.

“Just because someone crumples it, or stamps on it, the value of the note does not diminish.
We should all be like the five hundred rupee note.
In our lives, there will be times when we feel crushed, stamped over, beaten. But never let your self-worth diminish.
Just because someone chose to crush you – that doesn’t change your worth one bit!
Don’t allow your self-worth to diminish because someone says something nasty or does something dirty to you.”

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The Unconditional Love … !

I read this story somewhere, I don’t know … just posting it here … for it touches the heart so easily!

Once upon a time, a man punished his five-year-old daughter for using up the families only roll of expensive gold wrapping paper before Christmas.

Money was tight, so he became even more upset when on Christmas eve, he saw that the child had used the expensive gold paper to decorate a large shoe-box she had put under the Christmas tree.

nevertheless, the next morning the little girl, filled with excitement, brought the gift box to her father and said, ” This is for you, Daddy!”

As he opened the box, the father was embarrassed by his earlier over-reaction, now regretting how he had punished her.

But when he opened the shoe-box, he found it was empty and again his anger flared up. “Don’t you know young lady …,” He said harshly, “when you give someone a present there is supposed to be something inside the package!”

The little girl looked up at him with sad tears rolling down the cheeks and whispered with emotionally choked voice, “Daddy, it is not empty … I blew kisses into it until it was all full.”

The father was crushed. He fell on his knees and put his arms around his precious little one. he begged her to forgive him for his unnecessary anger.

It is said, an accident took away the life of the child only a short time later. The father kept this little gold box by his bed for all the years of his life. Whenever he was discouraged or faced difficult problems, he would open the box take out an imaginary kiss and remember the love of this beautiful child who had put it there.

In a very real sense, each of us human beings have been given this invisible golden box filled with unconditional love, affection and kisses from our children, families, friends and God.

So, you too just open your golden box and feel the love … because, there is no more precious possession anyone could hold!

2010 in review: My Blog at WordPress

The stats helper monkeys at WordPress.com mulled over how this blog did in 2010, and here’s a high level summary of its overall blog health:

Healthy blog!

The Blog-Health-o-Meter™ reads This blog is on fire!.

Crunchy numbers

Featured image

A Boeing 747-400 passenger jet can hold 416 passengers. This blog was viewed about 7,500 times in 2010. That’s about 18 full 747s.

 

In 2010, there were 21 new posts, growing the total archive of this blog to 44 posts. There were 26 pictures uploaded, taking up a total of 3mb. That’s about 2 pictures per month.

The busiest day of the year was May 6th with 84 views. The most popular post that day was … THE DYING TERRORIST (POEM).

Where did they come from?

The top referring sites in 2010 were facebook.com, google.co.in, in.yfittopostblog.com, orkut.co.in, and bigextracash.com.

Some visitors came searching, mostly for september 11, spontaneous human combustion, hindi skit script, hindi skit comedy script, and 9 11 pictures.

Attractions in 2010

These are the posts and pages that got the most views in 2010.

1

… THE DYING TERRORIST (POEM) November 2009
2 comments

2

SCHOOL INSPECTION (HINDI SKIT-FOR SEWAK DAY) September 2009
12 comments and 1 Like on WordPress.com,

3

SPONTANEOUS HUMAN COMBUSTION October 2009
6 comments

4

… HERMAN PERRY: THE AMERICAN SOLDIER WHO MARRIED A NAGA PRINCESS ! August 2009
4 comments

5

Myths And Legends Of Nagaland October 2009
15 comments

मुसद्दी लाल की गवाही (SKIT FOR SEWAK DAY 2010)

Mussaddi lal ki gawah

courtroom i

CAST:

  1. जज
  2. वकील
  3. गवाह

SCENE 1: COURTROOM: INTERNAL: DAY

सुत्रधार:

आप में से कई लोग कचहरी जातें हैं .. अपने केस मुकदमे के चक्कर में! कुछ लोग जज हैं .. कुछ वकील हैं, वे भी कचहरी जातें हैं .. पर कुछ ऐसे भी लोग हैं जो ना जज हैं ना वकील फिर भी उनका कचहरी में आना जाना लगा रहता है। उन्ही में से एक हैं हमारे मुसद्दी लाल .. एक प्रोफेशनल गवाह! काफी नामी गवाह हैं .. उनकी गवाही सुनने के लिये काफी भीड़ भी जम जाती है। काफ़ी किस्से मशहूर हैं उनके हमारे यहां .. अब आपको उनके किस-किस किस्सों के बारे में बतायें .. आप खुद ही देख लिजिये ..

इस एकांकी में गवाह मुसद्दी लाल का रोल …………………… निभा रहें हैं, वकील के रोल में हैं ……………….., और मेरा क्या रोल है, ये आप खुद ही देख लिजिये!

SCENE 2: COURTROOM: INTERNAL: DAY

सुत्रधार ही जज की कुर्सी पर बैठा है। आवाज आती है – मुसद्दी लाल हाजिर हो .. ! मुसद्दी लाल हाथ में कटहरा उठाये अदालत में दाखिल होता है।

मुसद्दी लाल:

बहुत गवाही देने जाना पड़ता है ना, इसलिये कटहरा अपने साथ ही लेकर चलता हुँ।

(फिर जज की ओर देख कर)

नमस्कार जज साब .. अएं, आप नये आये हैं का जज साब, पाठक जी थें ना आप से पहले? अच्छा घूंस लेने के कारण डिस्मिस विस्मिस हो गये होंगे, पाठक जी .. कितना मना किया था, साहब को!

वकील:

ठीक है .. ठीक है .., पहले आप गीता पर हाथ रख कर ..

मुसद्दी लाल:

(बीच में टोकता हुआ)

साब, ये गीता कहां? ये तो BRO का File है!

वकील:

ठीक है .. ठीक है, आप इसी पर हाथ रख कर कसम खाइये कि जो भी कहेंगे सच कहेंगे और सच के सिवा कुछ भी नही कहेंगे।

मुसद्दी लाल:

(जज की तरफ मुड़कर)

लो, सुनो ..! ये ऐसे ही बात हो गयी .. हमरे गांव मे एक रहा कलुवा .. अ एक ठो रही उसकी भैंस .. अ उसकी भैंस को हुआ एगो भैंसा ..

वकील:

(बीच में)

अब .., कलुवा और उसकी भैंस का इस शपथ से क्या संबंध?

मुसद्दी लाल:

जो सुना रहे है वो तो सुनो ना ..!

(जज की तरफ मुड़कर)

जज साब,जब भैंस को हुआ भैंसा, तो हमको मिल गया बाबू .. हम बोला, ए बाबू, कलुवा के भैंस को हुआ है एगो भैंसा .. तो जानते हैं का बोला?

जज प्रश्नवाचक अंदाज मे देखता है

मुसद्दी लाल:

बोला .. का हो, कलुवा का भैंस पेट से था का? अब आप बताओ, बिना पेट से हुये भी का भैंसा हो सकता है? आप पढ़े लिखे लोग भी ना .. जाने का बात करत हो! अरे ऐसे ही, जब हम सच बोलेंगे ही तो सच के सिवा और का बोलेंगे .. मतबल है कोइ इस बात का .. बताओ तो जरा?

वकील:

कानून है .., शपथ लो!

मुसद्दी लाल:

हां तो ठीक है, हम कोई कानून के बाहर थोड़े ही हैं .. लाइये हम शपथ लेते है।

(जज की ओर देख कर शपथ लेता है)

मैं जज साहब और ईश्वर को हाजिर-नाजिर जान कर शपथ लेता हुँ कि जो भी कहुंगा सच कहुंगा और, सच के सिवा कुछ भी नही कहुंगा।

(फिर वकील की ओर मुड़कर)

वैसे हमरी ये बात आप भी जान लो, सात पुस्तों में से भी आजतक किसी ने झूठ नही बोला है .. सबसे बड़ा सच तो यही है!

वकील:

अच्छा ठीक है ठीक है, ये बताओ, नाम क्या है?

मुसद्दी लाल:

किसका?

वकील:

अब यहां क्या आपको गांव के लोगों के नाम पूछने के लिये बुलाया है ..अपना नाम बताइये!

मुसद्दी लाल:

मुझे लगा के आप जज साब का नाम पूछ रहें हैं के ..(दर्शकों की ओर इशारा करके) इनका नाम पूछ रहें हैं के, उनका नाम पूछ रहें हैं!

वकील:

आप अपना नाम बताइये।

मुसद्दी लाल:

(जज की ओर इशारा करता हुआ)

जज साहब, ये पाठक जी कहां गये आपको मालूम है का? उनके एक रिश्तेदार के केस में भी हम ही गवाह हैं।

जज:

आप से जो सवाल किया जा रहा है सिर्फ उसका जबाव दें- अपना नाम बतायें।

मुसद्दी लाल:

हुजूर माई बाप, नाम का तो ऐसा है .. मां बाप ने तो रखा था .. छोड़ें साहब, गांव में तो जो मिल जाता है हमको कहता है – माधोलाल, तो कोई कहता है माधो भइया, तो कोई माधो मियां .. माधो भाईजान .. कोई-कोई तो ..

वकील:

ओह्हो, आप एक नाम बताइये।

मुसद्दी लाल:

नाम लिखना है तो लिख लिजिये .. मुसद्दी लाल .. ला लड़की का!

जज:

(टेबल पर हथौड़ा बजाते हुए)

आर्डर-आर्डर, क्या आप उनको (वकील की ओर इशारा करके)वर्णमाला सिखायेंगे?

मुसद्दी लाल:

नहीं-नहीं जज साब, क्या है ना कई बार गलती हो जाती है सुनने में ना .. फिर वकील साब तो अपने पुराने आदमी हैं ..।

वकील:

बस-बस ठीक है, बाप का नाम बताइये।

मुसद्दी लाल:

साब, हमारे यहां बाप का नाम जुबान पर नही लातें हैं।

वकील:

क्युं? क्या शर्म आती है?

मुसद्दी लाल:

(भड़क कर)

शरम काहे को आयेगी? आप को आती है क्या बाप का नाम लेने में? लिखिये .. हरि लाल पहलवान .. हरि लाल पहलवान .. हा हाथी वाला!

वकील:

अपनी उम्र बताइये।

मुसद्दी लाल:

का ..? काहे बताबें? कोई शादि-ब्याह करवाना है का?

वकील:

ओह, आप अपनी उम्र बताइये।

मुसद्दी लाल:

हुजूर, मैं जैसा हुं .. बूढ़ा हुं .. जवान हुं, आप के सामने हुं .., बस! आपको जैसा लगे, लिख लिजिये। इसी में अदालत का टाईम निकल जायेगा!

जज:

(वकील से)

आप ये सब क्यों पूछना चाहतें है?

वकील:

सर, मैं तो बस इनकी आईडेन्टिटी इस्टैब्लिश करना चाह रहा हुँ।

जज:

ठीक है, अब मेन मुद्दे पर आइये।

वकील:

ठीक है सर, बस एक और सवाल ..

(मुसद्दी लाल से)

क्या आप जेल जा चुके हैं?

मुसद्दी लाल:

जेल ..? अरे, जेल जाना कोई खराब बात है का? महात्मा गांधी भी तो गये थें जेल .. नमक बनाने के लिये!

वकील:

और .. आप किस लिये गये थे जेल?

मुसद्दी लाल:

दारू बनाने के लिये ..!

वकील:

दारू ..? क्या आपको मालूम नहीं, नागालैंड में दारू बनाना गैरकानूनी है?

मुसद्दी लाल:

उस टाईम में तो नमक बनाना भी उतना ही गैरकानूनी था .. गांधी बाबा से क्यूं नही पूछते है .. बड़ा आदमी थें, इसलिये क्या?

जज:

(वकील से)

आप क्यों ये सवाल पूछ रहें हैं?

वकील:

साहब, मैं अदालत के सामने ये तथ्य लाना चाहता हुं कि ये आदमी झूठी गवाही देने के आरोप में भी जेल जा चुका है।

मुसद्दी लाल:

अरे, ऐसी छोटी-मोटी बातें मुझे याद नही।

वकील:

छोटी-मोटी बातें?

मुसद्दी लाल:

हां, और नही तो क्या?

जज:

(मुसद्दी लाल से)

क्या आप अपनी सफायी में कुछ कहना चाहतें है?

मुसद्दी लाल:

सफायी के बारे में ..?

जज:

हां, सफायी के बारे में ..!

मुसद्दी लाल:

जज साब, मैं बहुत सफायीपसंद इंसान हुं .. दिन में दो बार नहाता हुं .. सफायी के लिये .. लक्स साबुन से, कभी लाइफबॉय से, कभी पीयर्स से, कभी हमाम से, तो कभी ..

जज:

मैने आपसे इस मसले पर सफायी के बारे मे पुछा था!

मुसद्दी लाल:

साहब, मैं तो हमेशा साफ-सुथरा रहता हुं .. आप मुझे सुंघ कर देखिये ना .. कोई बदबू नहीं ..!

जज:

(वकील से)

आप गवाह से इस मामले के संबंध में सवाल पूछिये।

वकील:

ठीक है, जज साहब

(मुसद्दी लाल से)

आप लालू को जानते हैं?

मुसद्दी लाल:

कौन .. यादव? चीफ मिनिस्टर रह चुके हैं, बिहार के ..!

वकील:

मैं लालूराम की बात कर रहा हुं .. आप के गांव का लालूराम .. आपका पड़ोसी!

मुसद्दी लाल:

हां साहब, हम तो खूब जानत रहें .. उ लालूराम के .. अरे, लंगोटिया दोस्ती जो रही!

वकील:

अच्छा, तो ये बताइये, लालू राम की उम्र क्या होगी?

मुसद्दी लाल:

अरे साहब, जब बताया की हमरे दोस्त रहें है तो ये उमर-बीम्मर क्या है .. कोई एतना सोंच के दोस्ती थोड़े करता है?

वकील:

आप सिर्फ इतना बतायें कि आप लालूराम को जानते है या नहीं।

मुसद्दी लाल:

बिल्कुल जानते है साहब, जैसे कंपुटर मे करंट होता है .. जैसे कलम में स्याही होता है .. जैसे समोसे मे आलू होता है, वैसे ही हमरे दिल मे वो है ..

वकील:

(बीच में)

फिर आप उनकी उम्र क्यों नही बता रहे है ..? बताइये।

मुसद्दी लाल:

उनकी उम्र .. लिखिये .. यही कोई ३० ..

वकील:

३० साल ..?

मुसद्दी लाल:

३० से ६० साल के बीच है ..!

वकील:

ये कौन सी उम्र है .. ३० से ६० साल के बीच?

मुसद्दी लाल:

अब हम कोई उनके छट्ठी मे भोज तो खाय नही रहें .. जो एकदम सही-सही ही बता पायें! जो बता रहें है सो लिख लो, ना तो खुदई पूछ लेना!

वकील:

अच्छा, आप ये बताइये उनका कद कैसा है .. लंबे है या नाटे?

मुसद्दी लाल:

है तो लंबे ..

वकील:

अच्छा, लंबे है?!

मुसद्दी लाल:

हां, लंबे है .. लेकिन ..

वकील:

लेकिन क्या?

मुसद्दी लाल:

लेकिन ये कि उनको बहुत जोर का दमा है .. तो थोड़ा झुक कर चलते है .. (झुक कर दिखाता है) इसलिये लगते नाटे ही है .. !

वकील:

(हक्का-वक्का होकर)

है ..? अच्छा उनका रंग कैसा है .. गोरा या काला?

मुसद्दी लाल:

साहब .., हैं तो गोरे ही ..

वकील:

अच्छा, गोरे है ..?

मुसद्दी लाल:

हां, गोरे है .., लेकिन ..

वकील:

अब लेकिन क्या?

मुसद्दी लाल:

साहब हमने सच बोलने की कसम खायी है .. तो, कहेंगे तो सच ही! लालूराम को, बताया ना, बड़े जोर का दमा है .. सो चेहरा कुम्हला गया है .. देख कर कोई बता नही सकता के गोरे है या काले!

वकील:

लालूराम के बाल कैसे हैं .. सफेद या ..

मुसद्दी लाल:

सफेद है, साब ..

वकील:

अच्छा, सफेद है ..!

मुसद्दी लाल:

हां, हैं तो सफेद ही .., लेकिन ..

वकील:

अब, लेकिन क्या?

मुसद्दी लाल:

साब, आजकल बाल कौन नही काले करता है .. सो वो भी कभी-कभी अपने बाल काले कर लेता है।

जज:

मुसद्दी लाल गवाह, आपको अदालत निर्देश देती है कि उल-जुलूल बातों से अदालत और अपना वक्त जाया न करें।

मुसद्दी लाल:

हुजुर, उल-जुलूल कहां ..? मैं तो सच बता रहा हुं और सच के सिवा कुछ भी नही .. कसम भगवान की!

वकील:

अच्छा, आप मुन्नू मियां को जानते हैं?

मुसद्दी लाल:

हां साहब, जैसे लालूराम को जानते है, वैसे ही ..

वकील:

थोड़ा विस्तार से बताये, मुन्नू मियां को कैसे जानते है?

मुसद्दी लाल:

बड़ा लालची है साहब, जब देखो तब हमरे बैठक में ही पड़ा रहता है .. पान-तमाखू के लिये! मुफतखोरी की आदत है ना साहब .. मुफत मे तो गोबर भी खिलाओ तो खा ले!

वकील:

अच्छा, मुन्नू मियां का कद कैसा है?

मुसद्दी लाल:

कद माने .. लंबाई?

वकील:

हां .. हां।

मुसद्दी लाल:

मुन्नू मियां का कद होगा .. यही कोई (हथेली नीचे की तरफ करके हाथ उपर-नीचे करता है)

वकील:

कितना ..?

मुसद्दी लाल:

इतना ..

(कंधे के बराबर हाथ रोक कर)

अ .. हां।

वकील:

(जज की ओर मुड़कर)

नोट किया जाये योर ऑनर, ये आदमी अदालत मे झूठ बोल रहा है .. जिस मुन्नू मियां का कद ये इतना बता रहा है, वो आदमी नहीं, मुर्गा है ..!

मुसद्दी लाल:

(हड़बड़ाकर, जज से )

अयं .., मुर्गा है? अभी रुकिये जज साहब .. झूठ कहां .. अभी दुसरा हाथ लगाया कहां है?

(दुसरा हाथ पहले हाथ के करीब ६ इंच नीचे लगा कर)

इतना .. मैं तो इतना ही कह रहा हुं .. ये वकील साहब सुनते ही नही हैं।

वकील:

आप सच बतायें वारदात के वक्त आप वहां थे या नही?

मुसद्दी लाल:

लो सुनो, हम काहे नही होंगे .. अरे हमरा तो काम ही है वारदात के वक्त खड़े होने का .. (फिर अपनी बात पर ही चौंक कर) मतबल .. किसी से भी पूछ लो .. हम तो वहीं थे। अब कोई घड़ी-घोड़ा तो है नहीं हम गरीबों के पास के आपको टाईम भी बता दें कि हां इतने बजे हम वहां खड़े थें और इतने बजे की वारदात है!

वकील:

ठीक है, वारदात के बारे में जो भी मालूम है वो अदालत को बताये।

मुसद्दी लाल:

(जज की ओर मुड़कर)

साहब हमरे गांव का सूरज डुबने ही वाला था ..।

वकील:

अब आपके गांव में क्या कोई निराला सूरज उगता है .. ये बताइये दिन था या रात?

मुसद्दी लाल:

(जज से)

जज साब, ये बताइये, हमरे गांव मे अगर सूरज डुब गया तो का सारे संसार मे सूरज डूब जाता है? कल को बगल गांव वाला कोई आकर अगर बता दे कि वहां सूरज नही डूबा था तो इ वकील साहब तो हमको झूठ बोलने के आरोप में जेल भिजवा देंगे ना .. ?

(फिर वकील की तरफ मुड़कर)

का वकील साहब .. है ना जायज बात? आप कल ये भी पूछ सकते है .. सूरज तुमरे ही गांव में क्यों डूबा? अरे, वो कोई हमरे मर्जी से चढ़ता गिरता है ..? वो तो होता ही रहता है .. कभी चढ़ता है कभी गिरता है! इसिलिये तो कहा है .. सुनिये:-

पर्वत से गिर कर भी संभल सकता है कोई,

नजर से जो गिर जाये उसको संभालेगा कौन?

मुसद्दी लाल अपनी बात पर खुद ही खूश होता हुआ जज की ओर देखता है।

जज:

आप शायरी छोड़िये और वकील साहब की बात का जबाव दिजिये।

मुसद्दी लाल:

(निराश होकर)

साहब, बुरा ना माने तो एक बात बोलूं .. पाठक जी ज्यादा अच्छे थें .. शेरो-शायरी में भी दखल रखतें थें।

वकील:

ये जो आरोप है लालूराम पर कि उसने अंतिम नागा का पिटायी किया है, इसके बारे में आप का क्या कहना है?

मुसद्दी लाल:

हम तो लड़ाई-झगड़े से कोसो दूर रहतें है साहब, हम क्या बता सकते है!

वकील:

तो आप मानते है, वारदात के वक्त वहां आप नही थें?

मुसद्दी लाल:

नही, हम तो वहीं थे!

(वकील की ओर देख कर सर हिला-हिला कर बोलता हुआ)

शपथ खाया है साहब, झूठ नहीं ना बोलेंगे! हमरे आगे भी दु लोग था और पीछे भी दु लोग .. बताइये कितना लोग था .. अब ऐसे में जो दिखा वोही तो बताएंगे ना आपको!

वकील:

ये जो चीखने की आवाज आयी थी, वो किस दिशा से आयी थी?

मुसद्दी लाल:

दिशा .. ? गरीबों की भी कोई दिशा होती है साहब? आप ही बताइये कि हमरे गांव में रात के अंधेरे में अगर कोई कुत्ता भूंकता है ..

(कुत्ते की आवाज निकालता है)

भूं ऽ भूं .., तो बताइये, वो आवाज किस दिशा से आती है?

जज अब कुर्सी से उठकर सुत्रधार की भूमिका मे (पीछे वकील और गवाह धीमी आवाज में जिरह करते रहते है)

जज:

बहूत सवाल किये वकील ने और हमारे रणबांकुरे मुसद्दी लाल भी डटे रहे। उसने वो जबाव दिये .. वो जबाव दिये कि मामला सुलझने की बजाय और उलझ गया, और आगे वही हुआ जो होता आया है …।

SCENE 3: COURTLROOM: INTERNAL: DAY

जज:

(टेबल पर हथौड़ा मारते हुए)

ऑर्डर-ऑर्डर, गवाह की गवाही और वकील की जिरह सुनकर अदालत अभी किसी भी नतीजे तक नही पहुंच पायी है इसलिये इस मुकद्दमे की कार्रवायी अगले सेवक डे तक के लिये मुल्तवी की जाती है।

मुसद्दी लाल:

(वकील की तरफ देख कर)

लो हो गया मुल्तवी, अरे हमको तो अगला डेट ही चाहिये था .. आप काहे इतना अनाप-शनाप सवाल पूछे जा रहे थे।

(फिर पॉकेट मे हाथ डालते हुये)

ए हुजूर आपके पास पाँच सौ का छुट्टा है का?

वकील:

किस लिये?

मुसद्दी लाल:

अरे लालूराम को वापस करना है .. सौ रुपया! हमरा फीस चारे सौ फी गवाही है ना .., जरुरत पड़े तो कभी आप भी याद किजियेगा साहब .. इस मुसद्दीलाल गवाह को ..!

पर्दा गिरता है।

Some inspiring parables

Parable Number 01:

A crow was sitting on a tree, doing nothing all day.

A small rabbit saw the crow, and asked him, “Can I also sit like you and do nothing all day?

The crow answered: “Sure, why not?”

So, the rabbit sat on the ground below the crow, and rested.

All of a sudden, a fox appeared, jumped on the rabbit and ate it.

Lesson: To be sitting and doing nothing, you must be sitting very, very high up.

Parable Number 02:

A turkey was chatting with a bull.

“I would love to be able to get to the top of that tree,” sighed the turkey, “but I haven’t got the energy.”

“Well, why don’t you nibble on some of my droppings?” replied the bull, “They’re packed with nutrients.”

The turkey pecked at a lump of dung and found that it actually gave him enough strength to reach the first branch of the tree.

The next day, after eating some more dung, he reached the second branch.

Finally after a fourth night, there he was proudly perched at the top of the tree.

Soon, he was spotted there by a farmer, who promptly shot the turkey out of the tree.

Lesson: Bullshit might get you to the top, but it won’t keep you there.

Parable Number 03:

A little bird was flying south for the winter.

It was so cold, the bird froze and fell to the ground in a large field.

While it was lying there, a cow came by and dropped some dung on it.

As the frozen bird lay there in the pile of cow dung, it began to realize how warm it was.

The dung was actually thawing him out!

He lay there all warm and happy, and soon began to sing for joy.

A passing cat heard the bird singing and came to the sound.

The cat discovered the bird under the pile of cow dung, and promptly dug him out and ate him!

Lesson: Not everyone who drops shit on you is your enemy. Not everyone who gets you out of shit is your friend. And when you’re in deep shit, keep your mouth shut!

Parable Number 04:

The boy rode on the donkey and the old man walked.

As they went along, they passed some people who remarked, “it is a shame the old man is walking and the boy is riding.”

The man and boy thought – maybe the critics were right, so they changed positions.

Later, they passed some other people who remarked, “What a shame, he makes that little boy walk.”

They decided they both would walk!

Soon they passed some more people who thought they were stupid to walk when they had a decent donkey to ride.

So, they both then rode the donkey!

Now, they passed some people that shamed them by saying “how awful to put such a load on a poor donkey.”

The boy and man said they were probably right so they decided to carry the donkey.

As they crossed a bridge, they lost their grip on the animal and he fell into the river and drowned.

Lesson: If you try to please everyone, you will eventually lose your ass.

Parable Number 05:

One morning an elderly man was walking on a nearly deserted beach.

He came upon a boy surrounded by thousands and thousands of starfish.

As eagerly as he could, the youngster was picking them up and throwing them back into the ocean.

Puzzled, the older man looked at the young boy and asked, “Little boy, what are you doing?”

The youth responded without looking up, “I’m trying to save these starfish, sir.”

The old man chuckled aloud, and queried, “Son, there are thousands of starfish and only one of you. What difference can you make?”

Holding a starfish in his hand, the boy turned to the man and, gently tossing the starfish into the water, said, “It will make a difference to that one!”

Lesson: Help is in doing, not in saying!

THE DONKEY … !

This story, I heard for the first time, when doing my post graduation at the medical college. Recently, it came to mind again when, I saw an officer in my unit misbehaving with a civilian and virtually throwing him out of his office by verbal rebuke. Here it goes:-

There was a potter in the village. He had a Donkey. The potter used to bring raw materials for his use on the back of this donkey. The potter, while bringing clay, wood etc from jungle, used to bring these in heavy loads so as to reduce the number of trips. But while going to sell his product he used to take pots and other earthen wares in small numbers, so that they remain safe, but increasing the number of trips to the market in effect. In both the conditions, the donkey used to suffer – either it had to carry the huge load or used to get beaten up, if not careful in carrying finished goods to the market. The donkey was very annoyed by the treatment it used to get at the hands of the master.

Then, there came the Deewali time. The potter decided to make statuettes of Gods like Ganesh and Laxmi. After making beautiful statuettes, he wanted to sell these at the market. The statuettes had really come out very beautifully. Every body, who saw the statuettes on the way, bowed to the Gods. Some even exclaimed about how beautiful it was. The Donkey, at the change of its fortunes but oblivious of its load and ignorant of the reason, thought people were praising his beauty and bowing to him! In the market statuettes sold at a premium and the potter made a good profit.

The Donkey was happy at the change he saw in the attitudes of people while going to the market and was flabbergasted. “May be, I am looking exceptionally appealing today”, came to its mind. Returning from market, while he came across a man, he stopped on the way, looked up, and expected the man to bow to him. That did not happen. The donkey swore at the ‘Idiot’ and then moved ahead. Slightly ahead on the way, another man came across. But, what is this? This man also did not bow to the donkey; neither did he say anything in its praise. The donkey was now furious seeing the neglect. It started to make sounds of protest, “… Hey Aeee, … Hey Aeee, … Hey Aeee!” This unexpected loud burst of cry made the potter very angry, he took out his stick and gave the donkey a good thrashing to remember for whole of its life.

This story is significant in the context of all those who have to deal directly with the public, specially the Civil Servants, who actually are ‘Servants’ and their job is to serve the public rather having the wrong notion of ruling over them by virtue of their posts. They must remember that if people bow to them, it may not necessarily be because of their innate capabilities but because of the chair they are holding. This chair is going to be removed from underneath in any case, like – after retirement or in some cases after suspension, and they should not make their situation like the donkey. It is incumbent upon them not to behave like the donkey – expecting everything naturally!